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---: वो 'मैं' ही है जो ज़िंदा है :---

---: वो 'मैं' ही है जो ज़िंदा है :---

📅 11 Sep 2026 | 🏫 Mathematics | 👁️ 11 Views

Atul Kumar Mishra
Mathematics

---: वो 'मैं' ही है जो ज़िंदा है :---

शब्दों के वृहद भंडार में,

एक ऐसा शब्द चुनिंदा है…

विनम्रता के आकार में,

वो 'मैं' ही है जो ज़िंदा है…

सज्जनता के आचार में,

भी यदि किसी की निंदा है…

तो उन निंदाओं के वार में,

वो 'मैं' ही है जो ज़िंदा है…

ऊपर होने की कतार में,

उड़ता दंभी जो परिंदा है…

वही श्रेष्ठ इस प्रमाण में,

वो 'मैं' ही है जो ज़िंदा है…

इकलौतेपन की आड़ में,

जो कार्य भी करता गंदा है…

तब गतिक स्वप्न साकार में,

वो 'मैं' ही है जो ज़िंदा है…

सब सही है इस विचार में,

भी नहीं यदि कोई चिंता है…

तो खुद के पत्राचार में,

वो 'मैं' ही है जो ज़िंदा है…

गर ग़लत-सही संसार में,

हमें दूजे की ही चिंता है…

हम ग़लत नहीं के विचार में,

वो 'मैं' ही है जो ज़िंदा है…

___रचना, अतुल कुमार मिश्र कृत


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